गांव-देहात में पीढ़ियों से चले आ रहे औषधीय पादपों के पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझना और प्रमाणित करना जरूरी है।
श्रीनगर (गढ़वाल)
गांव-देहात में पीढ़ियों से चले आ रहे औषधीय पादपों के पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझना और प्रमाणित करना जरूरी है। इससे औषधीय पौधों के संरक्षण, संवर्धन और उपयोग को नई दिशा मिलने के साथ ही शोध के सार्थक परिणाम सामने आ सकेंगे। यह बात हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह ने मंगलवार को उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक) में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि पौराणिक काल से ही औषधीय पादप पारंपरिक चिकित्सा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। प्रकृति में ऐसे अनेक पौधे मौजूद हैं, जो स्वाद में कड़वे होने के बावजूद मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद उपयोगी और लाभकारी हैं। इन पौधों के औषधीय गुणों को वैज्ञानिक कसौटी पर परखने और उनके संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। कुलपति ने कहा कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से औषधीय पादपों के क्षेत्र में नए शोध और संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं से औषधीय पादपों पर विशिष्ट और उपयोगी शोध करने का आह्वान किया। साथ ही युवाओं को नशे से दूर रहने और नशा उन्मूलन के लिए जागरूकता फैलाने की अपील की। उन्होंने कहा कि जीवन में लक्ष्य निर्धारित कर पूरी एकाग्रता और दृढ़ संकल्प के साथ उसके लिए प्रयास करना चाहिए। संगोष्ठी में देशभर से पहुंचे विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने औषधीय पादपों के संरक्षण, संवर्धन और उपयोग सहित विभिन्न विषयों पर 75 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए। मौके पर कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह ने हैप्रेक का निरीक्षण की शोध कार्यो कि जानकारी ली। इस अवसर पर डीन रिक्रूटमेंट एवं पदोन्नति प्रो. एमएस पंवार, कुलसचिव प्रो. वाईपी रैवानी, डीन एग्रीकल्चर एंड एलाइड साइंस प्रो. आरएस नेगी, अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. ओपी गुसाईं, हैप्रेक निदेशक प्रो. विजयकांत पुरोहित, डॉ. बबिता पाटनी, संगोष्ठी सचिव डॉ. विजयलक्ष्मी त्रिवेदी, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुदीप सेमवाल, डॉ. प्रदीप डोभाल, डॉ. जयदेव चैहान, जनसंपर्क अधिकारी आशुतोष बहुगुणा सहित अन्य मौजूद रहे।
